नई दिल्ली | फरवरी 2026
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित इंटरिम ट्रेड समझौते (India-US Trade Deal) ने राष्ट्रीय आर्थिक एजेंडा में नया विवाद खड़ा कर दिया है। सरकार ने बार-बार कहा है कि इस डील में किसानों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है, लेकिन किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे कृषि क्षेत्र के लिए घातक बताया है और “आत्मसमर्पण” जैसा आरोप लगाया है।
सरकार का रुख: किसानों के हित सुरक्षित
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल ने कहा है कि व्यापार सौदे में भारत ने अपनी “रेड लाइन्स” यानी कृषि और संवेदनशील घरेलू उत्पादों के लिए हरी लाइन नहीं पार की है और किसानों के हितों की रक्षा पूरी तरह की गई है। गोयल ने स्पष्ट किया कि समझौते में ऐसे कोई कदम नहीं हैं जो भारतीय कृषि को नुकसान पहुँचाएँगे।
सरकार का दावा है कि:
- जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फ़सलों का आयात डील में शामिल नहीं है
- संवेदनशील कृषि वस्तुओं (दूध, मांस, प्रमुख फलों व सब्ज़ियों) पर कोई छूट नहीं दी गई है
- अमेरिकी बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों को टैरिफ लाभ मिलेगा, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पुनः कहा कि ऐसे कोई प्रावधान नहीं हैं जो इंडियन फार्मर्स के हितों को खतरे में डाले।
किसान संगठनों की प्रतिक्रिया: “आत्मसमर्पण”
सरकार के दावों के बावजूद किसान संगठनों ने ट्रेड डील पर तीखा प्रहार किया है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और अन्य बड़े किसान समूहों का कहना है कि यह व्यापार समझौता भारतीय कृषि के लिए सीधे खतरा बन सकता है और लंबे समय तक किसानों के हितों को घटाएगा।
उनके मुख्य आरोप हैं:
- शून्य टैरिफ (Zero Duty) आयात: अमेरिका से कृषि एवं अन्य उत्पादों के लिए शुल्क कम या समाप्त करने से भारतीय बाजार सस्ते अमेरिकन माल से भर सकता है, जिससे स्थानीय किसानों की आय पर दबाव बढ़ सकता है।
- जानवरी-नवंबर 2025 डेटा: भारत में पहले से ही अमेरिकी कृषि आयात में वृद्धि देखी गई है — जैसे सोयाबीन तेल, कच्चे अनाज, आदि — जिनका असर स्थानीय बाजार पर पड़ा है।
- लघु एवं सीमांत किसानों के लिए जोखिम: छोटे किसानों के पास प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता सीमित है, जबकि अमेरिका जैसे देशों के पास बड़े पैमाने पर सब्सिडी और आधुनिक उत्पादन तकनीक है।
- “बैकडोर” जीएम उत्पादों की चिंता: कुछ किसान नेताओं ने कहा है कि डील में खाद्य और पशु आहार (DDGS) जैसे उत्पादों को शामिल करने से जीएम फ़सलों के अप्रत्यक्ष प्रवेश का खतरा है।
SKM ने यहाँ तक कहा है कि अगर कृषि या डेयरी उत्पादों को किसी भी तरह से ट्रेड डील में शामिल किया गया, तो यह 2020-21 की किसान आंदोलन जैसी नया संघर्ष ला सकता है।
विपक्ष और विश्लेषकों की बात
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी सरकार से मांग की है कि वह डील का पूरा टेक्स्ट सार्वजनिक करे ताकि किसानों और आम जनता को स्पष्ट रूप से समझ आए कि समझौता किस हद तक कृषि, डेयरी और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों पर असर डाल सकता है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए भारत जैसे कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था में मुक्त आयात से मुकाबला करना कठिन होगा क्योंकि अमेरिका में बड़े पैमाने पर सब्सिडी और तकनीकी लाभ मौजूद हैं।
निष्कर्ष: सुरक्षा का दावा, चिंता की वजह
सरकार यह स्पष्ट करती है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील में किसानों के हित सुरक्षित हैं और कोई संवेदनशील कृषि वस्तुओं पर समझौता नहीं हुआ है।
वहीं किसान संगठनों का मानना है कि जीएम उत्पादों, शून्य टैरिफ वाले आयात और बड़े विदेशी प्रतिस्पर्धा के चलते घरेलू कृषि संकटग्रस्त हो सकती है।
इस डील के प्रभाव का पूरा विश्लेषण तभी संभव होगा जब डील का पूरा टेक्स्ट सार्वजनिक होगा और वास्तविक बाजार प्रतिक्रियाएँ सामने आएँगी। फिलहाल यह मामला कृषि, सुरक्षा और आर्थिक संतुलन के बीच जारी बहस का केंद्र बना हुआ है।
आगामी संकेत
किसान संगठनों ने देशव्यापी प्रदर्शन के संकेत भी दिए हैं और यह मुद्दा आगामी दिनों में राजनीतिक व आर्थिक दोनों विमर्शों में अहम भूमिका निभा सकता है।













