खनन और विकास ले रहे हैं प्रकृति की जान: कोरापुट की हरियाली पर गहराता संकट

कोरापुट (ओडिशा)।

पूर्वी घाट की गोद में बसा Koraput कभी अपनी हरियाली, झरनों, पहाड़ियों और समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में खनन गतिविधियों और तेज़ी से बढ़ते विकास ने इस प्राकृतिक स्वर्ग के सामने गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोग इसे “विकास की कीमत” बता रहे हैं, तो पर्यावरणविद इसे आने वाले बड़े खतरे की चेतावनी मानते हैं।

खनन का विस्तार और बदलता भूगोल

कोरापुट और उसके आसपास के इलाकों में बॉक्साइट सहित कई खनिजों के भंडार मौजूद हैं। इन्हीं संसाधनों के दोहन के लिए बड़े पैमाने पर खनन परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। भारी मशीनों और विस्फोटकों के उपयोग से पहाड़ियों की संरचना बदल रही है। जंगलों की कटाई तेज़ हुई है और कई क्षेत्रों में हरियाली सिमटती जा रही है।

खनन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक रोज़गार और राजस्व मिला है, लेकिन इसके साथ ही धूल, शोर और भूमि क्षरण जैसी समस्याएं भी बढ़ी हैं। पहाड़ियों के कटाव से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है, जिससे खेती पर भी असर पड़ रहा है।

वायु प्रदूषण: सांसों में घुलती धूल

ग्रामीणों का कहना है कि खदानों के आसपास धूल का स्तर काफी बढ़ गया है। गर्मियों में तेज़ हवाओं के साथ उड़ने वाली धूल गांवों तक पहुंचती है। घरों की छतों, पेड़ों की पत्तियों और खेतों में धूल की परत जम जाती है। इससे फसलों की पैदावार घटने की शिकायतें सामने आई हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार धूल के संपर्क में रहने से सांस संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं। बच्चों और बुजुर्गों में खांसी, एलर्जी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं।

जलस्रोतों पर मंडराता खतरा

खनन क्षेत्रों से निकलने वाला अपशिष्ट बरसात के दौरान नालों और छोटी नदियों में बहकर पहुंचता है। इससे जलस्रोतों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कई गांवों में पेयजल के रंग और स्वाद में बदलाव की शिकायतें आई हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो जलजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है।

जल संरक्षण और शुद्धिकरण के ठोस उपायों के अभाव में स्थिति और गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि खनन कंपनियों को अपशिष्ट प्रबंधन की सख्त व्यवस्था अपनानी चाहिए और नियमित जल परीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।

आदिवासी समुदाय पर असर

कोरापुट की पहचान यहां के आदिवासी समुदायों से जुड़ी है। उनका जीवन जंगल, जमीन और जलस्रोतों पर निर्भर है। जब जंगल कटते हैं या जलस्रोत दूषित होते हैं, तो इसका सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ता है। कई परिवारों को अपनी पारंपरिक खेती छोड़कर मजदूरी की ओर जाना पड़ा है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि विकास योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सहमति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रियाओं को पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाना आवश्यक है।

प्रशासनिक पहल और वास्तविकता

राज्य स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण और पुनर्वनीकरण की योजनाओं की घोषणा भी होती रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं के प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय संगठनों का आरोप है कि निगरानी व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं है।

यदि विकास को स्थायी और संतुलित बनाना है, तो केवल कागजी योजनाओं से काम नहीं चलेगा। सख्त पर्यावरणीय ऑडिट, नियमित निरीक्षण और नियमों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है।

संतुलन की तलाश

विशेषज्ञ मानते हैं कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं—बशर्ते नीतियां संतुलित हों। खनन के साथ-साथ व्यापक वृक्षारोपण, जलस्रोत संरक्षण और स्थानीय रोजगार के वैकल्पिक साधन विकसित किए जाएं। हर परियोजना के साथ पर्यावरणीय प्रभाव का गंभीर आकलन किया जाना चाहिए।

कोरापुट केवल खनिज संपदा का भंडार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर भी है। यदि विकास की दौड़ में प्रकृति की अनदेखी की गई, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अब समय है कि विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रकृति की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, ताकि कोरापुट की हरियाली और शांति लंबे समय तक कायम रह सके।

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