गुजरात में नकली नोट (Fake currency) फैक्ट्री से ₹40 लाख जब्त। पुलिस ने प्रिंटर, मशीनें और गैंग का भंडाफोड़ किया। पढ़ें पूरी खबर और जांच अपडेट
4 सितम्बर 2025 बनासकांठा : रात दबोचने की कार्रवाई में बनासकांठा के महादेविया गांव का खेत सिर्फ मिट्टी का हिस्सा नहीं रहा—बन गया था करोड़ों की नकली मुद्रा का ठिकाना। बनासकांठा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच (LCB) को एक गुप्त सूचना मिली थी—कि किसी खेत के अंडर ग्राउंड तहखाने में बड़े स्तर पर नकली नोट छापने का काम चल रहा है। जैसे ही पुलिस टीम ने देर रात रेड मारी, वह रोज़ की कार्रवाई नहीं थी बल्कि एक पूरा स्वॉ capture the flag ऑपरेशन था।
चर्चा का विषय
पुलिस ने तहखाने में छापेमारी कर दी जिसमें दो आरोपी—संजय सोनी और कौशिक श्रीमाली—फिरोजेगंज स्थित गोदाम के भीतर प्रिंटर और स्टेशनरी के साथ रंगीन कागज़ पर नकली नोट छापते पाए गए। दोनों ने मौके पर ही काम कबूल कर लिया। वहीं, मामले में महादेविया गांव के खेत मालिक, रायमल सिंह परमार, जो यह पूरी योजना का मास्टरमाइंड माने जा रहे हैं, फरार पाए गए। राजा गया—लेकिन पुलिस ने 40 लाख रुपये मूल्य के नकली नोट, पांच प्रिंटर और संबंधित स्टेशनरी भी जब्त कर ली।

40 Lakh Counterfeit Notes Seized
पुलिस ने जांच शुरू करते हुए बताया कि परमार के खिलाफ पहले से ही 16 आपराधिक शिकायतें दर्ज हैं—फिरौती, धोखाधड़ी, मारपीट समेत कई गंभीर अपराध के आरोप। हाल ही में जेल से बाहर छूटे होने के बाद परमार ने संजय सोनी के साथ मिलकर खेत में तहखाना स्थापित किया और बड़े पैमाने पर नकली नोट छापना शुरू कर दिया।
ये पूरा खुलासा सिर्फ पंजाब या केरल की कहानी नहीं है—यह पूरी तरह गुजरात, खासकर बनासकांठा की कलई खोलने वाला उदाहरण है। इंडिया में नकली मुद्रा (FICN) की समस्या पुरानी है, और विशेषकर गुजरात बॉर्डर स्टेट होने के कारण यह और संवेदनशील घटना है। Reddit के एक ट्रेंडिंग थ्रेड में यह आधिकारिक आंकड़े भी बताता है कि भारत में कुल नकली मुद्रा में से लगभग 90% हिस्सा गुजरात से ही जुड़ा हुआ माना जा रहा है—रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 382 करोड़ रुपये नकली नोट्स पाए गए, जिसमें से 336 करोड़ वहीं से समाने आए।
इससे पहले भी भारत भर में नकली मुद्रा की कई बड़ी वारदातें हुई हैं—उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में रेलवे कर्मचारी गजेंद्र यादव के नेतृत्व में बड़े स्तर पर नोट छापे जाते थे; फिर गुजरात के सूरत से एक फैक्ट्री पकड़ी गई, जहां से 1.20 लाख रुपये मूल्य की नकली नोट्स और प्रिंटर आदि सामान बरामद हुए थे। इसी तरह लखनऊ, उत्तर प्रदेश में पुलिस ने ₹1.05 लाख नकली नोट्स जब्त कर गिरोह का पर्दाफाश किया था।
Banaskantha Fake Currency Case
इस Gujarat मामले की खासियत यह है कि यह खेती से जुड़े ग्रामीण इलाक़ों में तहखाना खोलकर नोट छापने की तिकड़म है—जो बताता है कि अपराध अब केवल बड़े शहरों या अंतरराष्ट्रीय तस्करी में ही नहीं, बल्कि आम गांवों तक फैला हुआ है। पिछले माह असम के लखीमपुर में पुलिस ने ₹14.43 लाख की नकली मुद्रा जब्त की, और दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया—बंदरदेवा पुलिस ने नकली नोट ट्रांसपोर्ट कर रहे आरोपी को मोटरसाइकिल सहित पकड़ लिया। इसी कड़ी में गुवाहाटी के कैचर में भी ₹63,000 नकली नोट जब्त हुए और एक आरोपी गिरफ्तार किया गया।
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जब हम बात करते हैं नोट की गुणवत्ता की—तो होश तब उड़ जाते हैं जब एक Karnataka निवासी Hussain Peera जैसे मास्टर काउंटरफिटर्स राजस्थान, गुजरात, Maharashtra समेत छह राज्यों तक अपना धंधा फैला देते हैं। उन्होंने इतनी बेहतरीन नकली नोट्स बनाई कि असली से फर्क पहचानना मुश्किल हो गया—उसके लिए पुलिस ने अलाइनमेंट, पेपर ग्रेड और सेक्योरिटी थ्रेड जैसे सब जांचने को कहा ताकि पता चलता कि कितनी गिरोह संरचित है।
नीति-नियंत्रण का विषय भी अहम है—2016 के नोटबंदी के दौरान नकली नोटों में तेजी आई थी, और RBI के आंकड़ों के मुताबिक उस समय नकली नोट्स का आंकड़ा बढ़ा लेकिन बाद में नियंत्रण में आया। माना जाता है कि ये कदम नकली नोट उत्पादन और प्रचलन को रोकने की दिशा में था, लेकिन फिर से पता चलता है कि जमीन पर धंधा खत्म नहीं हुआ था—बल्कि नए रूप में जगह पाई।
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इस Gujarat गिरफ्तारी की जैसे ही खबर फैली, पूरे साइबर स्पेस में लोग एक दूसरे को यकीन दिलाने लगे कि यह फर्जी नोट फैक्ट्री कितनी खतनाक थी—और तस्वीर में केवल एक संदिग्ध व्यक्ति नहीं था, बल्कि पूरे नेटवर्क, पैसे का खेल, और गांव-खे़त की जमीन तक फर्जी हुकूमत की निशानी थी।
Gujarat Police Bust Fake Notes Racket
पुलिस फिलहाल कथित मास्टरमाइंड परमार की तलाश में है और एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस पूरे गिरोह, उसके interstate links और संभावित पैसे के source की पूरी जानकारी देने वाली है।
यह मामला हमें याद दिलाता है कि नकली नोट सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं है—यह देश की सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, और जनता की आम जान पहचान पर हमला है। जब कोई खेत में तहखाना बनाकर नोट छापता है, तो वह सिर्फ कुछ नकली नोट नहीं बना रहा बल्कि देश की नींव हिला रहा होता है।
बहरहाल, इस बड़ी घटना पर गुजरात पुलिस की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन सवाल यह भी दिमाग में आता है—क्या ये केवल एक बूढ़ा गिरोह था या इससे बड़े और खतरनाक गिरोह जुड़े हुए हैं? क्या ग्रामीण इलाकों में ऐसी फैक्ट्रियां और कहीं हो सकती हैं? फिलहाल हमें यही उम्मीद है कि मास्टरमाइंड को जल्द ही गिरफ्त में लाया जाए और पूरे नेटवर्क का खुलासा हो।
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