नई दिल्ली/पटना/लखनऊ।
भारतीय खेती अब केवल मौसम और अनुभव पर निर्भर नहीं रही। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन और सैटेलाइट डेटा के जरिए खेतों में “सटीक खेती” का दौर शुरू हो चुका है। इसका असर साफ तौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में दिखने लगा है, जहां किसान धीरे-धीरे डिजिटल टूल्स को अपनाकर लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
सरकार के अनुसार, AI आधारित कृषि समाधान अब मिट्टी परीक्षण, फसल रोग पहचान, सिंचाई प्रबंधन और बाजार पूर्वानुमान तक पहुंच चुके हैं। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में डिजिटल एग्रीकल्चर पायलट प्रोजेक्ट्स के तहत अब तक 600 से ज्यादा जिलों में तकनीक आधारित खेती के प्रयोग किए जा चुके हैं।
बिहार: ड्रोन सर्वे से धान की निगरानी, मोबाइल ऐप से फसल सलाह
बिहार के समस्तीपुर, वैशाली और नालंदा जैसे जिलों में ड्रोन और AI आधारित प्लेटफॉर्म से धान और गेहूं की निगरानी शुरू की गई है। खेतों की हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेज के जरिए पौधों की ग्रोथ, नमी और कीट संक्रमण का आकलन किया जा रहा है।
राज्य कृषि विभाग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, AI सिस्टम अब शुरुआती स्तर पर ही लीफ ब्लाइट और ब्राउन स्पॉट जैसी बीमारियों की पहचान कर लेता है। इससे किसान समय रहते दवा डाल पा रहे हैं और 10–15 प्रतिशत तक नुकसान बचाने में सफल हो रहे हैं।
बिहार में मृदा स्वास्थ्य कार्ड डेटा को AI मॉडल से जोड़कर यह भी बताया जा रहा है कि किस खेत में कितनी यूरिया या डीएपी की जरूरत है। इससे खाद पर होने वाला खर्च औसतन 12–18 प्रतिशत तक घटा है।
उत्तर प्रदेश: गन्ना और आलू की खेती में डेटा आधारित फैसले
उत्तर प्रदेश के मेरठ, शाहजहांपुर और बाराबंकी क्षेत्रों में AI आधारित सिस्टम से गन्ना और आलू की खेती को ट्रैक किया जा रहा है। सैटेलाइट डेटा के जरिए सिंचाई शेड्यूल तय हो रहा है और मोबाइल अलर्ट से किसानों को मौसम बदलाव की जानकारी मिल रही है।
राज्य सरकार के डिजिटल एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट के तहत कुछ जिलों में “प्राइस फोरकास्ट मॉडल” भी लागू किया गया है, जो मंडी भाव का अनुमान पहले ही दे देता है। इससे किसान तय कर पा रहे हैं कि फसल कब बेचनी ज्यादा फायदेमंद रहेगी।
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मुताबिक:
- AI आधारित फसल सलाह से पायलट इलाकों में उत्पादकता 8–20% तक बढ़ी है
- उर्वरक और पानी की खपत औसतन 15% तक घटी है
- रोग पहचान समय 40% तक कम हुआ है
वहीं सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग के जरिए खेतों का रियल-टाइम डेटा उपलब्ध कराने में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की भूमिका अहम हो गई है। ISRO के कृषि उपयोग कार्यक्रमों के तहत अब हर 10–15 दिन में मिट्टी की नमी और फसल स्थिति का अपडेट राज्यों को मिल रहा है।
सरकारी लक्ष्य है कि 2027 तक कम से कम 5 करोड़ किसानों को किसी न किसी रूप में AI आधारित कृषि सेवाओं से जोड़ा जाए।
चुनौतियां: नेटवर्क, प्रशिक्षण और भरोसे की कमी
हालांकि तस्वीर पूरी तरह आसान नहीं है। बिहार और यूपी के कई गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी कमजोर है। स्मार्टफोन होने के बावजूद कई किसान ऐप चलाने में असहज महसूस करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक तभी सफल होगी जब गांव स्तर पर प्रशिक्षण, स्थानीय भाषा में प्लेटफॉर्म और भरोसेमंद सरकारी सिस्टम तैयार किया जाए। निजी कंपनियों पर अत्यधिक निर्भरता और डेटा सुरक्षा भी बड़े सवाल बने हुए हैं।
भविष्य की खेती: अनुभव + एल्गोरिद्म
नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की ताकत उसके किसान का अनुभव है, और AI उस अनुभव को वैज्ञानिक आधार देता है। जब खेत की मेड़ पर खड़ा किसान मोबाइल स्क्रीन पर मिट्टी, मौसम और बाजार का पूरा डेटा देखता है, तब खेती सिर्फ परंपरा नहीं रहती — वह एक रणनीतिक व्यवसाय बन जाती है।
बिहार और उत्तर प्रदेश के शुरुआती प्रयोग बता रहे हैं कि अगर सही ढंग से लागू किया गया, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस खेती की लागत घटाकर किसानों की आमदनी बढ़ा सकता है और देश की खाद्य सुरक्षा को नई मजबूती दे सकता है।
खेती में AI अब भविष्य की बात नहीं रही — यह वर्तमान की जरूरत बन चुकी है।
न्यूज़ डेस्क













