नकली दाँत बने जानलेवा: प्रयागराज में एंडोस्कोपी से महिला की जान बची

नकली दाँत बने जानलेवा: प्रयागराज में एंडोस्कोपी से महिला की जान बची

प्रयागराज में 60 वर्षीय महिला खाना खाते समय नकली दाँत निगल गईं। दाँत खाने की नली में फँस गया, लेकिन डॉक्टरों ने एंडोस्कोपी से सिर्फ़ 1 घंटे में उनकी जान बचाई। जानिए पूरी घटना और सावधानियाँ।

घटना संक्षेप में –

आज के समय में नकली दाँत (Dentures) या आंशिक दाँत (Partial Denture / Crown / Bridge) का उपयोग बेहद आम है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ प्राकृतिक दाँत कमजोर हो जाते हैं और बुज़ुर्ग मरीज अक्सर दाँत निकलने के बाद डेंचर का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि यही नकली दाँत कभी-कभी जान के लिए खतरा भी बन सकते हैं?

प्रयागराज से एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सबको हिला दिया। एक महिला खाना खाते वक्त अपना नकली दाँत निगल गई और वह खाने की नली (Esophagus) में फँस गया। हालात इतने नाजुक हो गए कि उनकी जान तक जा सकती थी, लेकिन डॉक्टरों ने एंडोस्कोपी की मदद से चमत्कारिक रूप से उनकी जान बचा ली।


घटना की पूरी कहानी

महिला की उम्र: 60 वर्ष

स्थान: प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

समस्या: खाना खाते समय नकली दाँत ढीला होकर अंदर चला गया।

परिणाम: सांस लेने में तकलीफ़, तेज़ दर्द, उल्टी और घबराहट।

अस्पताल: नारायण स्वरूप हॉस्पिटल, प्रयागराज

बचाव: एंडोस्कोपी के द्वारा दाँत निकालना

⏱ सिर्फ़ एक घंटे में हुआ इलाज

डॉक्टरों की टीम – डॉ. राजीव सिंह (वरिष्ठ लैप्रोस्कोपिक सर्जन), डॉ. आकाश शाह (गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट), डॉ. अवनीश तिवारी और डॉ. शिवांशु – ने मिलकर केवल 1 घंटे में सुरक्षित रूप से नकली दाँत निकाल दिया।

डॉ. सिंह का बयान:

“अगर थोड़ी देर और हो जाती तो सांस की नली पूरी तरह ब्लॉक हो सकती थी और जान बचाना मुश्किल हो जाता।”


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नकली दाँत क्यों खतरनाक हो सकते हैं?

हर साल भारत में हजारों बुज़ुर्ग मरीज नकली दाँत पहनते हैं। यह सुविधा तो है, लेकिन इसके कुछ जोखिम भी हैं।

खतरे का कारण संभावित समस्या

दाँत का ढीला होना खाने के दौरान फिसलकर निगल जाना
तेज किनारे (Sharp Edges) गले या नली में चोट
निगलने में गलती सांस रुकना / choking
संक्रमण खाने की नली में घाव से संक्रमण
लापरवाही से फिटिंग दाँत की पकड़ कमजोर होना


यहाँ पढ़े :- दांतों की कमजोरी से बचाव | Weak Teeth Prevention Tips 2025

एंडोस्कोपी कैसे बचाती है जान?

एंडोस्कोपी एक आधुनिक तकनीक है जिसमें एक पतली ट्यूब जैसी दूरबीन में कैमरा और उपकरण लगे होते हैं।

प्रक्रिया:

  1. मरीज को हल्की बेहोशी दी जाती है।
  2. एंडोस्कोप को मुँह से अंदर ले जाया जाता है।
  3. कैमरे से सटीक जगह देखी जाती है।
  4. स्पेशल ग्रिप से फँसा हुआ दाँत निकाला जाता है।

⏱ पूरी प्रक्रिया लगभग 30–60 मिनट में पूरी हो जाती है और मरीज को सर्जरी जैसी बड़ी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।


भारत में नकली दाँत से जुड़े केस

वर्ष अनुमानित केस (Reported) प्रमुख कारण

2021 ~4,000 डेंचर का ढीला होना
2022 ~4,500 गलत फिटिंग / पुराने डेंचर
2023 ~5,000+ निगलने की समस्या, बुज़ुर्गों की लापरवाही

(यह डेटा इंडियन मेडिकल जर्नल में प्रकाशित आर्टिकल्स और रिपोर्ट्स पर आधारित है)


यहाँ पढ़े :- नकली दांत बने जानलेवा, डॉक्टरों ने एंडोस्कोपी से बचाई महिला की जान

डॉक्टरों की चेतावनी और सुझाव

नकली दाँत पहनने वाले हर 6 महीने में डेंटल चेकअप ज़रूर करवाएँ।

अगर दाँत ढीला लगे तो उसे बार-बार चिपकाने की बजाय री-मेक या री-फिट करवाएँ।

सोते समय नकली दाँत निकालकर रखें।

बच्चों और बुज़ुर्गों को अकेले कठोर खाना (जैसे मांस, गन्ना, ड्राई फ्रूट्स) चबाने न दें।

निगलने में दिक्कत हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।


विशेषज्ञ की राय

“नकली दाँत ज़िंदगी आसान करते हैं, लेकिन इनकी देखभाल न की जाए तो यह जानलेवा साबित हो सकते हैं। लोगों को चाहिए कि वे लापरवाही न करें और समय-समय पर अपने डेंटिस्ट से फिटिंग चेक करवाते रहें।”
– डॉ. राजीव सिंह, प्रयागराज


आम जनता के लिए शिक्षा

यह घटना एक wake-up call है।

नकली दाँत पहनना सामान्य है, लेकिन सावधानी अनिवार्य है।

किसी भी आपातकाल में तुरंत गैस्ट्रो/डेंटल/ENT डॉक्टर से संपर्क करें।

घरेलू इलाज (जैसे उल्टी कराने की कोशिश) न करें – इससे नुकसान बढ़ सकता है।


FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1: क्या नकली दाँत हमेशा खतरनाक होते हैं?
👉 नहीं, अगर सही फिटिंग और समय-समय पर चेकअप हो तो यह सुरक्षित हैं।

Q2: अगर नकली दाँत निगल जाए तो क्या करें?
👉 तुरंत नज़दीकी अस्पताल जाएँ और एंडोस्कोपी कराएँ। देरी न करें।

Q3: नकली दाँत कितने साल चलते हैं?
👉 आम तौर पर 5–7 साल, लेकिन यह उपयोग और देखभाल पर निर्भर करता है।

Q4: क्या बच्चे भी नकली दाँत पहन सकते हैं?
👉 हाँ, कुछ मामलों में बच्चों के लिए भी डेंचर बनाए जाते हैं, लेकिन इनकी देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है।


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